“वसन्तकाल आ गया। कामदेव ही इसका सेनापति था। मलय पर्वत के सर्पों से श्वास भर-भरकर आपीत चन्दनगंधिता वायु मन्थर गति से चल पड़ी। वियोगियों के हृदय सुलग उठे। मन्मथ ने आम्रबौरों के मधु का स्वाद ले-लेकर लाल कण्ठ हो गए कोकिल की मधुर ध्वनि और भ्रमर-गुञ्जार ने दसों दिशाएँ प्रतिध्वनि कर दीं। मानिनी युवतियाँ भी चपल हो उठीं। आम्र, निर्गुण्डी, रक्ताशोक, पलाश और तिलक में नई कोंपलें फूट आईं और रसिकों के हृदय में मदनमहोत्सव मनाने का उल्लास भर गया।””
Dashkumarcharit